कैसे मैं CRPF Head Constable Ministerial के पद पर भर्ती हुआ ? Part-2

अगर आपने मेरी कहानी का पहला पार्ट नहीं पढ़ा है तो यहां क्लिक करें कैसे मैं CRPF Head Constable Ministerial के पद पर भर्ती हुआ ? Part-1, अब आगे……

कैसे मैं CRPF Head Constable Ministerial के पद पर भर्ती हुआ ? Part-2

मेरा मोबाइल वापस कैसे मिला

मेरे पापा ने मुझसे कहा कि बेटा चिंता मत करो दूसरा दिलवा देंगे तुम ठीक हो बस इतना काफी है और मोबाइल ले लेंगे तुम सही सलामत घर आ जाओ फिर स्टेशन पर जाकर मैंने जनरल डिब्बे की टिकट ली और वापस अपने घर चला आया। लेकिन मैं बचपन से मोबाइल, इंटरनेट में ज्यादा इंटरेस्ट रखता था। इसलिये मैंने पहले से ही उस मोबाइल में Mobile Tracker लगा रखा था। जैसे ही कोई उस मोबाइल की सिमकार्ड को चेंज करता था उसके जस्ट 2 सेकेंड में उसमें डाली गयी नयी सिम से एक मैसेज मेरे पापा के फोन पर आ जाता था जिसमें उस सिम का नम्बर, तथा लोकेशन आ जाती थी। कहीं न कहीं मुझे विश्वास जरूर था कि जिसने भी मोबाइल चुराया होगा सिम तो डालेगा ही।

अब मैं तो घर वापस आ गया था फिर धीरे धीरे करके मेरे दोनों दोस्तों का भी फिजिकल हो गया , मोना और नीरज दोनों फिजिकल में पास हो गये। अब बारी आने वाली थी रिटिन की । हम तीनों लोग रिटिन की तैयारी करने लगे थे जिसके लिये मैंने एक किताब भी ले ली थी और मैंने कोचिंग सेंंटर भी ज्वाइन कर लिया था । मैं PGDCA कर रहा था जिसमें जाकर मैं पहले 10 मिनट तक टाइपिंग की प्रैक्टिस भी करता था। इस प्रकार मेरी टाइपिंग प्रैक्टिस अलग चल रही थी और रिटिन की तैयारी अलग से चल रही थी। हम तीनों लोग आपस में किताबों को बदलकर पढ़ाई किया करते थे।

8 मार्च 2013 को मेरे पापा के मोबाइल पर एक मैसेज आया, यह मैसेज और कोई नहीं उसी का मैसेज था जिसने भी मेरे नोकिया 5233 मोबाइल में सिम डाली थी, जो मोबाइल मेरा चोरी हो गया था उस मोबाइल में अब किसी ने सिम डाल ली थी। मैंने तुरंत मैसेज खोलकर देखा तो उसमें लोकेशन दिखा रहा था वाराणसी की और जो सिम डाली गयी थी उसका नम्बर भी आ गया था। मैंने तुरंत उस नम्बर पर कॉल लगाया। उधर से किसी लेडीज की आवाज आयी मैंने कहा यह मोबाइल आपके पास कहां से आया, वह बोली कि मेरे शोहर लाये हैं, वह एक मुस्लिम लेडी थी। मैंने कहा कि यह मोबाइल चोरी का है, आपके पास कहां से आया, इतना सुनते ही उस महिला ने मोबाइल तुरंत स्विच ऑफ कर लिया।

Also read : श्रीनगर में मेरा पहला दिन

अब मैं बार बार उस नम्बर पर कॉल लगा रहा था लेकिन मोबाइल स्विच ऑफ जा रहा था। अगले दिन उसने नयी सिम डाली, वो नम्बर भी ट्रैक होकर मेरे पापा के मोबाइल में मैसेज में आ गया। अब मेरे भाई ने बात की और सीधा कहा कि मैं  सिविल लाइन थाने से SHO बोल रहा हूं, आपके इस नम्बर पर रिपोर्ट दर्ज हुई है कि आप यह मोबाइल चोरी का इस्तेमाल कर रहे हैं, इतना सुनते ही उस महिला की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। फिर उसके घर के किसी बुजुर्ग व्यक्ति ने बात की। उससे पूंछा कि यह मोबाइल कहां से लाये हो तो उसने बताया कि ये मोबाइल 1500 रुपये का मोबाइल मंडी से खरीदा है। वहां कोई मोबाइल मंडी होगी जहां पर ऐसे चोरी के फोन बिकते होंगे खैर आगे वह बुजुर्ग भी काफी डर चुका था क्योंकि मेरे भाई ने इस अंदाज में कहा ही था ऐसा लग रहा था जैसे वास्तव में कोई दरोगा ही बात कर रहा हो।

उस बुजुर्ग व्यक्ति के घर के पास कोई लड़का मोबाइल की दुकान किये हुए होगा, उसने वह मोबाइल उस लड़के को दे दिया और बताया कि यह देख किसी का फोन आ रहा है और कुछ बता रहा है। फिर मैंने उस लड़के से बड़े ही आराम से बात की। वह लड़का बी.एस.सी कर रहा था और साथ में ही मोबाइल की दुकान भी चलाता था। उस लड़के ने मुझे बताया कि कोई व्यक्ति इन्हें इस मोबाइल को बेंच कर चला गया और ये बुजुर्ग आदमी हैं इनको पता नहीं था कि मोबाइल चोरी का है या नहीं, और इनको मोबाइल के बारे में जानकारी भी नहीं थी।

इन्होंने समझा सस्ता दे रहा है, तो ये ले लिये। उस लड़के ने बहुत ही सरल भाषा का इस्तेमाल किया। उसने  बड़े ही नर्म अंदाज में बात करी । फिर मैंने उससे कहा कि मोबाइल सर्विलांस पर लगा हुआ है, आप इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते । यह मोबाइल मेरा है, मुझे वापस दे दो। वह बोला कि ठीक है ले जाओ। वाराणसी इटावा से लगभग 600 किलोमीटर पड़ता है। मैंने उससे कहा कि आप कानपुर या लखनऊ तक आ जाओ इतना ही मैं इधर से आ जाता हूं, आपका जितना भी खर्चा होगा मैं आपको दे दूंगा, लेकिन वह आने के लिये तैयार नहीं हुआ । वह बोला कि आप मुझे पुलिस में पकड़ा देंगे, मारेंगे, पीटेंगे। बोला कि आप ले जाओ , मैं आपका मोबाइल में कछ भी नहीं किया हूं, जैसा था वैसा ही है। उसमें 16 जीबी का मैमोरी कार्ड भी पड़ा था, वह भी है।

Also read : मेरी जम्मू से श्रीनगर तक की यात्रा

मैंने उससे बहुत कहा कि भाई तुम्हें कुछ भी नहीं करेंगे, तुम मोबाइल लेकर आ जाओ। दोस्तों रियल बात यह भी थी मैं भी डर रहा था किसी दूसरे के इलाके में जाकर आप अपना मोबाइल कैसे ला सकते हैं, मैं कहीं मोबाइल लेने जाऊं, कहीं खुद ही पिट कर न आ जाऊं। इसलिये मैं उसको बोल रहा था कि आधी दूरी वो चले और आधी दूरी मैं चलूं, उसका जितना भी खर्चा होगा मैं देने के लिये तैयार था, लेकिन वह लड़का तैयार नहीं हुआ। फिर मेरे ताऊ का लड़का जो कि दिल्ली में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है उसका दोस्त जो कि उसी का रूम पार्टनर था, उसका घर वाराणसी में ही पड़ता था औऱ वह उस समय अपने घर वाराणसी में ही था। मैंने उसको वह मोबाइल लाने के लिये बोला।

मैंने उस लड़के की उस दोस्त से बात करायी और दो तीन दिन बाद वह मोबाइल मेरे हाथ में आ गया। अपना मोबाइल पाकर मैं बहुत खुश हो गया था और अपना मोबाइल पाकर अब मैं यह भी सोच रहा था कि शायद भगवान की यही मर्जी थी कि मैं दिन भर मोबाइल में लगा रहता हूं इसका मोबाइल की गुम करा दिया इस वहाने में पढ़ाई तो कर लिया था, जिसकी वजह से मैं आज एक सरकारी नौकरी करता हूं।

जब हमारा Written Exam हुआ 

खैर अब आगे की बात बताता हूं आखिरकार वह दिन भी आ गया जिस दिन हमारा रिटिन होना था, यानिकि 10 मार्च 2013. हम तीनों लोग (मैं, मोना और नीरज) जनरल डिब्बे में एक साथ इटावा से चले और रात में 11 बजे लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पहुंच गये। जब मैैं इटावा से चला तो बिल्कुल भी सर्दी नहीं थी सभी लोग शर्ट में घूमते थे लेकिन जब मैं रात में लखनऊ स्टेशन पर पहुंचा मुझे तो बहुत ठंड लग रही थी मैंने दोनों लोगों से पूंछा कि तुम्हें भी ठंड लग रही है क्या , वह बोले यार यहां तो बहुत ठंड है। फिर हम लोगों ने निर्णय लिया कि हम लोग सुबह 4 बजे सेंटर पर पहुंचेंगे तब तक यहीं स्टेशन पर सो जाते हैं। मैंं और मेरे दोनों दोस्त वहीं चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर खुले आसमान के नीचे एक पॉलीथीन बिछाकर लेट गये ,वहां पर पहले से ही काफी लोग लेटे हुए थे ।

हमने भी वहीं साइड से जगह बनाकर तीनों लोग लेट गये। वह तो शुक्र था कि मोना एक चादर डाल लाया था जिसे रात में तीनों लोगों ने एडजस्ट करते हुए ओड़ा लेकिन ठंड तो बहुत बड़ती ही जा रही थी। मैं उस रात को कभी नहीं भुला सकता। उस रात मैं ठंड में सिकुड़ता रहा और स्टेशन के बाहर खुले आसमान के नीचे रात भर पड़ा रहा। नींद तो आ ही नहीं रही थी ठंड की वजह से । मेरा पूरा शरीर ठंड की वजह से कांप रहा था। लेकिन जैसे तैसे रात निकाल ली। सुबह 4 बज गया। हम लोगों ने अपना बोरिया बिस्तर उठाया और ऑटो में बैठने के लिये पहुंचे। वहां पर पहले से ही काफी सारे लड़के रुके हुए थे। हम लोगों ने ऑटो वाले से पूंछा कि ये काशीराम सांस्कृतिक स्थल कहां है , चलोगे क्या। वह बोला ये सभी लोग वहीं जायेंगे आप लोग भी इसी में बैठ जाओ। हम तीनों लोग उस ऑटो में बैठ गये और जहां रिटिन होना था उस सेंटर के बाहर पहुंच गये।

Also read : मेरी श्रीनगर में पहली पोस्टिंग

अब वहां पर क्लियर इंस्ट्रक्शन था कि कोई भी मोबाइल या अन्य ़डॉक्युुमेंट अन्दर नहीं ले जायेगा। अब हम तीनों के पास एक एक मोबाइल था। इस बार मैं सस्ता वाला मोबाइल लेकर गया था, क्योंकि एक बार मेरा मोबाइल चोरी हो चुका था और मैं नहीं चाहता ता कि दोबारा मोबाइल चोरी हो। वहां पर भी कुछ लोग बैग जमा कर  रहे थे, लेकिन वहां पर दुकाने नहीं थीं, लोग अपने घर में ही जमा कर रहे थे और एक कागज के टुकड़े पर नम्बर डाल दिये थे और वही नम्बर उस बैग पर डाल देते थे। भीड़ बहुत थी काफी सारे लड़के इकट्ठा हो चुके थे। वहीं सड़के के किनारे पर एक गरीब महिला और उसकी एक बच्ची गमले बनाने का काम किया करते थे और उनका एक टैम्परेरी घर था त्रिपाल लगाकर अपना गुजारा कर रहे थे, जिन्हें हम आम भाषा में बंजारे वाला बोलते हैं।

वह महिला भी रुपये के लालच में बैग जमा करने लगी और लकड़ियों से बने टट्टर का घर जो कि त्रिपाल लगा हुआ था उसमें 10-10 रुपये में बैग जमा करने लगी। जब वह बैग जमा कर रही थी तब तो भीड़ नहीं थी एक या दो लड़के आते थे अपना बैग जमा करके चले जाते थे। वह महिला भी एक कागज पर नम्बर डाल कर दे रही थी। हम तीनों ने अपने सारे मोबाइल और अन्य सामान उस बैग में डाला और उस महिला के पास जमा कर दिया और टोकन ले लिया, जो कि सिर्फ एक नम्बर था सादा कागज के टुकड़े पर। हम तीनों लोग पेपर देने के लिये एंट्री कर लिये । जब ग्राउंड में गये तो देखा अन्दर बहुत सारे झण्डे लगे हुए थे। वहां पर दुनिया भर का फोर्स नजर आ रहा था।

मैंने एक सिपाही से पूंछा कि सर मुझे कहां बैठना है। उसने मेरा वही कॉल लैटर देखा और रोल नम्बर के हिसाव से उसने मुझे एक झण्डे की तरफ जाने का इशारा किया । मैं उधर ही चल दिया, फिर वहां पर मेरा रोल नम्बर के हिसाब से मुझे बैठने के लिये बोला, वहां पर न कोई टेबल थी और न ही कोई छत। खुले आसमान के नीचे दोपहर में ऊबड़ खाबड़ खेत में बैठकर हमने पेपर दिया। पेपर तो ठीक ही कर लिया था लेकिन मैथ मुझे कम आता था इसिलये मैंने मैथ वाला सेक्शन सबसे बाद में अटेम्पट करने का सोचा था। अब पेपर पूरा हो चुका था। हम तीनों लोग वहां से बाहर आये और अपना बैग लेने के लिये उसी महिला के झोपड़ी में गये।

वहां पहुचे तो देखा वहां तो लोगों का मेला लगा है क्योंकि जितने भी लड़के पेपर देने के लिये आये थे सबका पेपर एक साथ छूटा तो सारे लड़के उस महिला की झोपड़ी में टूट पड़े अपना अपना बैग लेने के लिये। उन लड़कों ने उस महिला के सारे गमले फोड़ दिये थे, जो कि वह बनाकर बेंचती थी और उसकी झोपड़ी पर पड़ी हुई वह त्रिपाल फाड़ डाली और लड़के उसकी झोपड़ी के अन्दर घुस कर अपना अपना बैग निकाल रहे थे। मैं तो यह सब नजारा देखकर दंग रह गया था क्योंकि वह महिला इतनी सारी भीड़ देख कर बेहोश हो चुकी थी और वहीं किनारे पड़ी थी जिसे कोई भी नहीं देख रहा था। उसकी एक छोटी से बच्ची रो रही थी। किसी भी लड़के को दया नहीं आ रही थी, मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या किया जाये। मैं भी अपना बैग ढूंढ रहा था लेकिन मेरा बैग मिल ही नहीं रहा था ।

मेरे साथ अन्य कई लड़के भी खड़े थे जिनके भी बैग नहीं मिल रहे थे। उनमें से कोई बोल रहा था कि कई लड़के 2-3 बैग एकसाथ लेकर गये हैं होसकता है मोबाइल की वजह से लेकर गये हों । उस बैग में मेरे हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के ओरिजनल डॉक्युमेंट थे,और तीनों का मोबाइल भी था। इस बार मोबाइल की टेंशन नहीं थी लेकिन डॉक्युमेंट की टेंशन थी। काफी देर तक बैग ढूंढने के बाद पाया कि मेरा बैग नाली में पड़ा था, जो कि एक सिरे से भीग चुका था। वह बैग मिट्टी में पड़ा रहने के कारण पहचान में नहीं आ रहा था। लेकिन मोना ने उस बैग को पहचान लिया था उसने तुरंत वह बैग उठाया खोला तो देखा कि वास्तव में वह हमारा ही बैग था उसमें हम लोगोंक के ही डॉक्युमेंट थे।

अपना बैग से डॉक्युमेंट निकालकर हम लोग वापस रेलवे स्टेशन की तरफ निकले। रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो देखा वहां भी बहुत भीड थी यह भीड़ वही थी जो लडके भर्ती देखने के लिये आये थे। वहां पर आर.पी.एफ की काफी सारी फोर्स जमा हो रखी थी। इन लड़को की बत्तमीजी को रोकने के लिये। जब ट्रेन आयी तो उसमें सारे लड़के एक साथ घुसने लगे , किसी ने भी टिकट नहीं लिया था। हम तीनों ने भी टिकट नहीं लिया और उन लड़को के साथ ही भीड़ में उस ट्रेन में घुस गये। उन्नाव निकलने के बाद हमारी ट्रेन में टीटी आया टिकट चैकिंग करने के लिये।

उसने एक लड़के से टिकट पूंछा , वह लड़का बोला कि नहीं है। टीटी बोला कि फाइन लगेगा। इतना सुनते ही सारे लड़के एक साथ जोर जोर से चिल्लाने लगे, कि मारो साले को, गालियां देते हुए सारे लोग चिल्ला रहे थे। कोई बोल रहा था कि फेंक दो इसको चलती ट्रेन से। हम लोग रिजर्वेशन वाले डिब्बे में घुसे हुए थे, लेकिन भीड़ बहुत थी। टीटी भी डर गया और वहां से चला गया। उसने किसी का  भी टिकट चैक नहीं किया। फिर रात को नौ बजे के लगभग मैं वापस अपने घर आ गया।

आगे की कहानी पढ़ने केे  लिये नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।

Please follow and like us:
9 Comments

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *