CRPF HCM : JOURNEY FROM TC JAMMU TO SRINAGAR

दोस्तों मेरी पहली कहानी तो आपने पढ़ी ही होगी अगर नहीं पढ़ी है तो नीचे दिये लिंक पर क्लिक करके आप मेरी CRPF HCM JOINING की कहानी पढ़ सकते हैं और इस कहानी में मेरे साथ घटित हुई सारी सच्ची कहानी लिखी है कि कैसे मैंने CRPF JOIN किया और मैं कैसे श्रीनगर गया। आज मैंने यह दूसरी कहानी लिखी है जिसमें मैंने बताया है कि मेरी श्रीनगर की नौकरी कैसी रही।

मेरी पहली पोस्टिंग श्रीनगर में

दोस्तों मैं और मेरे साथ 07 लड़के और थे जिन्होंने मेरे साथ ही CRPF HCM JOIN किया था वह आज हमारे सबसे अच्छे मित्र हैं।

हम टोटल आठ लोग थे जिनमें से लक्ष्मण सीनियर था और वही हमारा कमाण्डर था क्योंकि वह सिपाही/जीडी पद पर सी.आर.पी.एफ में पहले से ही था वह श्रीनगर पोस्टेड रह चुका था उसे श्रीनगर के बारे में सब पता था इसलिये उसे ही हमारा कमाण्डर बनाया गया था। वह डिपार्टमेंटल एग्जाम देकर हवलदार बना था और मंत्रालय विभाग में आया था।

जब हम ट्रांजिट कैम्प जम्मू पहुंचे

हम लोग जम्मू रेलवे स्टेशन से बस से ट्रांजिट कैम्प जम्मू पहुंचे जहां पर हमारा फॉलइन किया गया और हमसे हमारा फोर्स नम्बर पूंछा गया, फिर हमारे कमाण्डर ने बोला कि जाओ लेटने की जगह ढूंढो हम लोग तो पहली बार आये थे हमने कहा सर हमे क्या पता कहां ढूंढ़ना है आप ही बताइये न तो वह बोले सुहागरात को भी हमें ही बुला लेना और सभी हसने लगे। फोर्स में तो ऐसे मजाक चलता रहता है। वहां चार मंजिल की एक बिल्डिंग थी जिसमें बहुत सारे कमरे थे और उन कमरों में डबल डैकर चारपाई लगी हुई थीं जिन पर एक बहुत ही गंदा फटा हुआ गद्दा बिछा हुआ था हम लोगों ने कहा सर यहीं लेट जाते हैं बहुत बढ़िया चारपाई मिल गयी है। सर ने कहा अभी तो बहुत अच्छी है इसमें इतना खटमल है कि रात में सोने नहीं देगा। फिर सर हमें एक कमरे में लेकर गये जो कि काफी बड़ा लग रहा था और उसमें एक बहुत बड़ा टीवी लगा हुआ था जिस पर न्यूज का चैनल लगा था और काफी भीड़ थी सर ने कहा यही ठीक है। हम सभी लोग वहीं पर साइड से जगह बना लिये और अपना बिस्तर बिछाये और सभी लोग वहीं पर लेट गये। मैं तो आपको बता ही चुका हूं कि मेरा मोबाइल वगैरह में ज्यादा इंटरेस्ट रहता है तो मैं तो अपने मोबाइल में बिजी हो गया था उस समय मेरे पास मोबाइल था NOKIA 5233  और उसमें एक डोकोमो की सिम पड़ी हुई थी और वहां पर उसका नेटवर्क नहीं था । आप लोगों को शायद पता नहीं होगा कि जम्मू का पहला जिला पड़ता है कठुआ जो कि पंजाब के पठानकोट के बाद आता है । जम्मू कश्मीर के अलावा जितने भी मोबाइल सिम कार्ड होते हैं वह कठुआ में घुसते ही बंद हो जाते हैं, किसी अन्य राज्य का सिम कार्ड जम्मू कश्मीर में कार्य नहीं करता है इसलिये हम सभी लोगों का मोबाइल डिब्बा बन चुका था और सच पूंछो तो उन सबमें मैं सबसे बैचेन था क्योंकि मेरा नेट नहीं चल रहा था जैसे तैसे दिन तो काट लिया शाम होने को आयी लगभग 5 बज चुका था फिर हम लोग उस कमरे के बाहर से निकले औऱ ग्राउण्ड में आ गये क्योंकि टी.सी. जम्मू के अन्दर जाने के बाद आप बाहर नहीं जा सकते हैं हम सभी लगो एक जेल में बंद हो चुके थे। फिर हमने देखा कि एक लड़का छोटी से कुर्सी पर बैठा कुछ छतरी लगाकर कुछ बेंच रहा था हम सभी पास गये तो देखा कि वह जम्मू कश्मीर की सिम कार्ड बेच रहा था मैंने उससे पूंछा कि कितने की सिम दी उसने कहा 40 रुपये की, मैंने अपने सर से पूंछा कि सर ले लूं क्या उन्होंने कहा हां ले लो ऊपर जाकर थोड़ी मुश्किल होगी मैं समझा नहीं कि ऊपर जाकर का क्या मतलब फिर उन्होंने बताया कि ऊपर का मतलब है श्रीनगर , वह बहुत ऊंचाई पर स्थित है इसलिये सभी लोग ऐसे ही बोलते हैं कि ऊपर जाकर थोडा महंगा मिलेगा और समस्या भी होगी क्योंकि जम्मू तो शांत इलाका है हमारे यूपी जैसा लेकिन कश्मीर में आप ऐसे खुले नहीं घूम सकते। मैंने रिलांइस की सिम खरीदी जिसमें 80 रुपये का टॉकटाइम मिला , उसके लिये मैंने अपनी एक आईडी उसको दी और एक फोटो भी दी। मैं किसी से बात नहीं करता था क्योंकि मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी और न ही आज है मेरा टाइम केवल नेट में ही निकलता था । सिम लेने के बाद अब मैं इंतजार करने लगा कि कब यह एक्टीवेट होगी ।

शाम का खाना और वह चांदनी रात

सिम लेने के बाद अब टाइम हो गया खाने का, वहां पर इतनी भीड थी कि क्या कहना लगभग 400 जवान थे और सभी अपनी बटालियन में जाने के लिये उस कैम्प परिसर में रुके हुए थे क्योंकि सी.आर.पी.एफ का ऐसा नियम है कि आप डायरेक्ट श्रीनगर नहीं जा सकते अगर आप डायरेक्ट अपनी गाड़ी से जाते हैं या सिविल गाड़ी से जाते हैं तो वहां पर आपकी जान को खतरा रहता है, इसलिये सी.आर.पी.एफ की गाडियो में जाते हैं सभी लोग प्रोटेक्शन के साथ। खाने के लिये टोकन बांटे जा रहे थे टोकन लेने वालों की लंबी लाइन लगी हुई थी। मेरे साथ का एक लड़का उस लाइन में लग गया और उसने हम सबके लिये खाने का टोकन लिया फिर हम सभी ने खाना खाया, खाने के बाद पानी पीने का नम्बर आया तो देखा वहां पर भी लंबी लाइन लगी हुई है। साला मैं तो परेशान हो गया था लाइन में लग लगकर, खैर कोई बात नहीं पानी पीकर हम सभी लगो थोड़ी देर तक बाहर ही बैठे रहे फिर हम लोग उस बिल्डिंग की सबसे ऊपर वाली छत पर गये वहां से हमें पहाड़ो की ऊंचाई साफ दिखायी दे रही थी और हमे यह भी दिख रहा था कि पहाड़ो के ऊपर छोटे छोटे घर बने हुए हैं मैंने सर से पूंछा कि सर ये घर गिरते नहीं हैं वह बोले नहीं । मैंने पहली बार पहाड़ देखे थे । उस चांदनी रात का मजा मैंने आज तक कभी नहीं लिया जनवरी का महीना था सर्दी भी बड़ रही थी और आपको बता दूं कि हमारे यहां कोहरे वाली सर्दी पड़ती है लेकिन जम्मू कश्मीर में कोहरा नहीं होता है वहां सूखी सर्दी पड़ती है आपको दूर दूर तक सब कुछ बिल्कुल साफ साफि दिखायी देगा लेकिन सर्दी बहुत पड़ती है खैर उस समय जम्मू में इतनी सर्दी नहीं पड रही  थी वहां पर तो दिन में धूप निकली थी और हम लोगों को कुछ खास सर्दी महसूस भी नहीं हुई थी। हम सभी लोग उस छत पर लगभग 10 बजे तक ऐसे ही कश्मीर के बारे में पूंछते रहे कि सर वहां कितनी सर्दी पड़ रही होगी वहां के लोग कैसे रहते होंगे, और मैं तो एकदम बच्चों वाले सवाल पूंछ रहा था कि सर मेरी बटालियन में भी बर्फ गिरती है। सर बोले नहीं तेरी बटालियन को छोड़कर पूरे कश्मीर में बर्फ पड़ती है सभी लोग ठहाकों के साथ उस सर्द भरी रात का मजा ले रहे थे। धीरे धीरे ठंड भी बड़ रही थी फिर हमारे सर ने बोला कि चलो सोते हैं चलकर काफी रात हो गयी है और सर्दी भी बड़ रही है। हम सभी लगो नीचे उसी कमरे में आ गये जहां पर तो लग ही नहीं रहा था कि यहां कोई सोयेगा क्योंकि उस कमरे में टीवी लगा हुआ था और सारे जवान उसी कमरे में पड़े हुए थे कोई स्लीपिंग बैग में घुसा हुआ था कोई रजाई में , कोई अपने घर बात कर रहा था, कोई गाली गलौज करके बकचोदी पेल रहा था उस रात में हमें 01 बजे के लगभग नींद आयी । अगले दिन जब हम सुबह उठे फिर से वही खाने के लिये टोकन के लिये लाइन लगाना । इस बार हमने तीनों टाइम का टोकन सुबह ही ले लिया था फिर हमने नाश्ता किया और फिर ग्राउण्ड में गप्पे मारने लगे हसी मजाक में कब 12 बज गया पता ही नहीं चला।

जम हम जम्मू से चलना शुरू किये

3 बजे ग्राउण्ड में कैम्प के सभी जवानों को फॉलइन किया गया और उसमें हम सभी लोग भी शामिल हुए उसमें बताया गया कि लैण्ड स्लाइड हो जाने के कारण कानवाई 3 दिनों से बंद थी अब कल कानवाई जायेगी श्रीनगर , अनंन्तनाग , कुपवाड़ा वाली सभी यूनिटों के जवान सुबह तीन बजे तैयार रहेंगे उनके लीव सर्टिफिकेट उनके रूम में बांटे जायेंगे। मैं तो पूरी तरह से कन्फ्यूज हो चुका था कि ये कानवाई क्या है तब सर ने हमें बताया कि सुबह 70-80 बसें एक साथ यहां से रवाना होंगी श्रीनगर के लिये जिसमें हम सभी जवान एक साथ चलेंगे और ये बसे आगे पीछे नहीं होंगी सभी बसे एक साथ एक के पीछे एक होकर चलेंगी। हमें बताया गया कि हमें वर्दी पहनकर ही बस से जाने दिया जायेगा हमारे सर ने पहले से हमें बता कर रखा था कि हम वर्दी पहन कर ही जायेंगे वह इसलिये रास्ते में अगर कहीं बस किसी होटल पर रुकती है तो कहीं कोई सिविलियन न चढ़ जाये । हालांकि मेरी ट्रेनिंग नहीं हुई थी लेकिन मैंने वर्दी पहले से ही बनवा रखी थी हम लोग सुबह 02 बजे उठकर फ्रेश होकर वर्दी पहनी औऱ ग्राउण्ड में आ गये फिर मैन गेट खोल दिया गया और हम लोग अपनी अपनी बस ढूंढने लगे, क्योंकि वहां पर लगभग 70 – 80 बसें खड़ी थीं, कुछ ही देर में हम लोगों को अपनी बस मिल गयी उसमें हम सभी लगो एक साथ बैठ गये। सभी बसें एक साथ चलना स्टार्ट हुईं और हमने जम्मू से अपनी यात्रा आरम्भ की श्रीनगर के लिये सुबह तीन बजे से। काफी देर तक तो मैं खिड़की से बाहर झांकता रहा मुझे कब नींद आ गयी मुझे नहीं पता चला।

कश्मीर की वह वादियां/पहाडियों का दृश्य

सुबह 7 बजे के समय मेरी आंख खुली तो देखा हम एक हाइवे पर चल रहे थे और मौसम का क्या कहना बादलों के बीच से होकर गुजर रहे थे चारों ओर से ठंडी हवा आ रही थी पहाड़ों के बीच की हरियाली , दोस्तों बहुत ही मस्त मौसम था ऐसा मौसम मैंने पहले कभी नहीं देखा था। हमने सर से पूंछा कि सर कहां पहुंच गये वह बोले ये ऊधमपुर है। मैंने कहा कि श्रीनगर कितना टाइम लगेगा वह बोले कि रात तक पहुंच पायेंगे। मैंने पूंछा कितना किलोमीटर है वह बोले 370 किमी. मैं सोच रहा था कि यार इतना तो हम 4-5 घंटे में पार कर लेते हैं , मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था फिर जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गये हमें सब समझ में आता गया कि कैसे 370 किमी की दूरी में इतना टाइम लगता है वहां के सारे रास्ते टेड़े मेड़े थे मतलब जहां से बस जाती थी थोड़ी आगे चलकर फिर बस उसी जगह पर आ जाती थी बस ऊंचाई बढ़ जाती थी । वहां की सड़के गोल गोल थी और पहाड़ो के ऊपर बनायी हुई थी फिर धीरे धीरे हम लोग चलते रहे। हम लोग रामवन पहुंचे जहां का बाजार काफी अच्छा लग रहा था वहां पर बहुत चहल पहल थी उसे भी हमने पार लिया था उसके बाद मैं फिर सो गया और जब आंख खुली तो देखा हमारी बस बहुत ही ऊंचे पहाड पर चल रही थी वहां से नजारा देखने लायक था नीचे का सब कुछ दिख रहा था मैं तो उस जगह पर एक फोटो खींचने की सोच रहा था लेकिन बस रुकी नहीं। फिर हम लोग एक होटल पर रुके जहां पर कुछ खाने पीने की चीजें ली। हम बस से उतरे तो देखा पहाड़ो के बीच में एक बहुत ही अच्छी दुकान बनी हुई थी जिसमें कोई कश्मीरी लड़का कुछ खाने का आइटम बेच रहा था हम लोगों ने एक एक आमलेट खाया वहां पर मुझे अहसास हुआ कि मुझे कुछ ऊंचा सुनाई दे रहा था मैंने सोचा कि शायद कुछ बात होगी तब बाद में पता चला कि सभी को ऊंचा सुनाई दे रहा है, पहाड़ो के बीच अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऊंचा सुनने लगते हैं क्योंकि वहां पर वायुदाव कम होता है। हम लोग फिर बस में चड़े और चलना शुरू किया। आगे चलकर एक सुरंग पड़ी जिसका नाम है जवाहर सुरंग यह बहुत ही बड़ी सुरंग थी यह सुरंग एक बहुत बड़े पहाड को खोदकर बनायी गयी है। इसमें 2.6 किलोमीटर अंधेरे में चलने के बाद जैसे ही हमारी बस उस सुरंग को पार करी तो देखा कि ट्रक के ट्रक बर्फ में दबे हुए हैं चारों ओर इतना बर्फ मेंने तो पहली बार देखा था । इतना बर्फ देख कर मैं परेशान था कि आखिर यहां के लोग कैसे रहते होंगे । मैं खिड़की से बाहर झांककर देख रहा था कि कश्मीरी पूरे शरीर पर कुछ ओड़े हुए थे जिनसे उनका पूरा शरीर ढका हुआ था कुछ भी नहीं दिख रहा था वहां पर बहुत ही ज्यादा ठंड पड़ रही थी। काफी देर तक बाहर देखने के बाद मुझे फिर नींद आ गयी । 9 बजे के समय मेरी आंख खुली जैसे ही खिड़की खोली इतनी ठंडी हवा कि मेरे साथ वाला सो रहा था वह उठ गया औऱ बोला कि बंद कर यार, इतनी बर्फ की वजह से बहुत ही ठंडी हवा चल रही थी । हम लोग चलते रहे । रात में 12 बजे के समय बस श्रीनर पहुंची वहां पर आर.टी.सी. में सभी लोग उतरे वहां से सभी ने अपनी अपनी बटालियन के लिये बस चेंज की। हम सभी लगो वहीं से अलग अलग हो गये थे मेरे साथ एक लड़का और था जिसकी पोस्टिंग मेरे ही साथ मेरी ही बटालियन में हुई थी जिसका नाम था मनोज उरॉव। हम दोनों लोग अपनी बस में बैठ गये। हमारे कमाण्डर लक्ष्मण सर ने हमें हमारी यूनिट की बस में बिठाया और एक कंट्रोल रूम का नम्बर दिया और बोले कोई दिक्कत हो इस नम्बर पर बात कर लेना। हम लोग डरे हुए बस में बैठ गये यहां तक तो बहुत मजा आया क्योंकि हम सभी लोग साथ में थे यहां से हम सभी अलग अलग हो गये। फिर बस वहां से चलना शुरू की औऱ 1 घंटे में लगभग 12 बजे हमारे बस हमारी बटालियन में बहुंच गयी। वहां पर हम एक कमरे में सोये औऱ सुबह उठकर ऑफिस गये सारी बात बतायी सभी लोगों से मिले अधिकारियों से मिले।

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तो दोस्तों ये था मेरा जम्मू से श्रीनगर तक का सफर बहुत ही यादगार सफर था मेरी जिंदगी का। अपने इस सफर को मैं अपनी पूरी जिंदगी में भुला नहीं सकता। अगली कहानी में जल्दी ही लिखूंगा अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो जरूर शेयर कीजिये।

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